पागल बना रहे टीवी के तोते शमीम शर्मा

क्या आप जानते हैं कि आपको आपसे चोरी कर लिया गया है। आपके दिमाग पर डाका पड़ चुका है और आपको खबर तक नहीं। हम देखने में मनुष्य लगते हैं लेकिन हमें तेजी से रोबोट बनाया जा रहा है। हमारी सोच अलग-अलग रंग बिरंगी स्क्रीन्स में बांध दी गई है और उंगलियां व्हाट्सएप, ट्विटर और फेसबुक ने टेढ़ी कर डाली हैं ।कहेंगे कैसे? हम तो आज भी वैसे ही हैं। दिल धड़क रहा है, दिमाग सोच रहा है। अपनी मर्जी से जो चाहे कर सकते हैं। बस यही तो खूबी है उस डाके की जो पड़ चुका है और सब इतनी सफाई से कि आपको महसूस तक नहीं हो रहा। ये जो हर शाम सात से रात 12 बजे तक सैकड़ों स्क्रीनों पर अलग-अलग रंगों के तोते, हम और आप बिना पलक झपकाए देखते रहते हैं, कभी ध्यान दिया कि इन सबकी टें-टें एक ही तरह की क्यों होती है।अगर इसका नाम ही बोलने की आजादी है तो इस टें-टें के मुकाबले हम और आप छत पर चढ़कर चीखते हैं कि शट-अप, मेरी बात सुनो, मैं कुछ अलग से कहना चाहता हूं। आपके घरवाले न सही लेकिन आजूबाजू वाले ज़रूर कहेंगे कि इसकी बुद्धि सरक चुकी है। इसे डॉक्टर के पास ले जाओ।आप कहके देखें कि बुद्धि उन तोतों की सरक चुकी है जो रोजाना टीवी पर अलग-अलग शक्लें और नाम सजाए एक ही राग-कोरस में गा रहे हैं। और इतना ऊंचा गा रहे हैं कि हमें कुछ अलग से सोचने की मोहलत ही न मिले। अगर सोच भी लें तो इस शोर में दूसरे को क्या, खुद अपने ही कानों को अपनी कही बात सुनवा न पाएं।आप ज़रा कहकर तो देखें कि पागल मैं नहीं, ये हैं जो हम सबको एक ही सोच के सांचे में ढालना चाह रहे हैं ताकि हम कोई सवाल न उठा सकें, इस टें-टें से अलग होकर किसी को चैलेंज न कर सकें। डॉक्टर के पास मुझे नहीं, इन्हें भेजो ।मगर ऐ भोलेलाल, तुम्हारी कौन सुनेगा। जिनकी सच्चाई पर कोई सवाल करे तो उसे बाकी लोग पत्थर मारें जो जितना जाली माल बेच सके उसका कमीशन, उसकी पगार उतनी ही ज्यादा। क्या इस सब कारोबार से मुक्ति मिल सकती है। हां मिल सकती है। मगर मुक्ति चाहता कौन है। एक बलात्कार पर हजारों का जुलूस निकालने वाले रोजाना करोड़ों दिमागों के बलात्कार के खलिाफ कितनी बार सड़क आए या आएंगे, कैसे आएंगे। दिमाग तो चुराए जा चुके, दिलों पर डाका पड़ चुका । जो चंद इस बाढ़ में बच गए, उन्हें पागलखाने में रखा जा रहा है। कभी सोचा को कि टीवी स्क्रीन से निकलने वाला धुआं कितना नुकसानदेह है। -----------------