बदलाव की बयार लाई किसान चाची

एक बंद समाज की दहलीज लांघकर अपना नया मुकाम तय करना किसी स्त्री के लिये आसान नहीं होता। फिर पुरुष के वर्चस्व वाले क्षेत्र में पहचान बनाना और परिवार को आत्मनिर्भर बनाने के साथ हजारों चूल्हों को जलाना आसान नहीं है। मगर बिहार के मुजफ्फरपुर के सरैया प्रखंड के गांव आनंदपुर की राजकुमारी ने ये सब कुछ कर दिखाया। इसी माह जब उन्हें सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया तो उनके गांव में होली से पहले ही फिजां में अबीर-गुलाल घुल गया। ?उनके मार्गदर्शन में चलने वाले चालीस स्वयं सहायता समूहों के लिये यह उत्सव का अवसर था।आज देश राजकुमारी को किसान चाची के नाम से जानता है। मैट्रिक करके पंद्रह साल में ब्याह दी गई राजकुमारी जब ससुराल पहुंची तो चूंघट की बंदिशों के समाज में खुद को पायाशिक्षक पिता ने लाड प्यार से पाला था। उसने टीचर की ट्रेनिंग लेकर पढ़ाना चाहा तो परिवार ने मना कर दिया। परिवार में जमीन का बंटवारा हुआ तो बेरोजगार पति के हिस्से में सिर्फ ढाई एकड़ जमीन आई, जिसमें तंबाकू आदि की खेती होती थी, जिससे घर चलाना मुश्किल था। ऐसे में राजकुमारी घर चलाने निकली। परिवार-समाज के तानों से बेपरवाह ऐसी राह चुनी जो रूढ़िवादी समाज में संभव न थी राजकुमारी ने पाया कि खेती में सबसे ज्यादा महिलाएं ही मेहनत करती ALLERATURBAT हैं मगर उनके श्रम को न तो पहचान मिलती है और न ही कुछ नया करने का अवसर। यहीं से राजकुमारी की किसान चाची बनने की कहानी शुरू होती है। उसने अपने खेत में फसल चक्र में बदलाव किया। वर्ष 1990 में ओल, हल्दी और पपीते की फसल उगानी शुरू की। नजदीक के कृषि विश्वविद्यालय में संपर्क कर मिट्टी परीक्षण व आधुनिक तकनीक से नकदी व जैविक फसलों के उत्पादन का प्रशिक्षण लिया ।किसान चाची ने महसूस किया कि यदि हम उत्पादित अनाज व सब्जी तथा फल बाजार में बेचते हैं तो ?औने-पौने दाम में खरीद लिया जाता है। यदि खाद्य प्रस्संकरण के जरिये अचार-मुरब्बा आदि बनाकर बेचा जाये तो ज्यादा आमदनी हो सकती है। समस्या यह थी कि अपना उत्पाद गांव से बाहर कैसे बेचा जाये। उसने कमर कसी और खुद ही साइकिल से मेले-ठेल पर बेचने निकली। पहले तो पति व परिवार ने विरोध किया मगर बाद में किसान चाची का संकल्प देखकर हामी भर दी। आज साठ साल की उम्र पार करने पर भी किसान चाची रोज तीस-चालीस किलोमीटर साइकिल चलाकर अपने उत्पाद बेचती है। उसके अचार व मुरब्बे आदि विश्वसनीय ब्रांड बन गये हैं। उसके उत्पादों की महक किसान मेले के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री लाल प्रसाद यादव ने महसूस की और किसान चाची को पुरस्कार दिया। फिर वर्ष 2007 में किसान चाची को 'किसान श्री' सम्मान दिया गयावर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उसकी कामयाबी से इतने मुग्ध हुए कि महिला उद्यमशीलता को नमस्कार ध हुए कि महिला उद्यमशीलता को नमस्कार करने किसान चाची के घर पहुंचे चाची की कामयाबी इस मायने में महत्वपूर्ण है कि उन्होंने हजारों महिलाओं को उन्नत खेती करने के लिये प्रेरित किया। उन्हें बताया कि कैसे खेती को लाभकारी बनाकर ज्यादा मुनाफा कमाकर स्वावलंबी बना जाये। महिलाओं को राह दिखाती उन पर बनी डॉक्यूमेंट्री खासी चर्चित हुई। कालांतर वह कई कृषि विश्वविद्यालयों की समितियों तथा राष्टीय खाद्य सुरक्षा मिशन की सदस्य भी बनी। किसान चाची मिसाल है कि मजबूत इरादों और प्रगतिशील सोच से मुश्किल लक्ष्य भी हासिल किये जा सकते हैं। किसान चाची के प्रशंसकों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तथा बिहार के राज्यपाल रहे और वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी हैंपद्मश्री देते वक्त राष्ट्रपति ने ?उन्हें नाम से संबोधित कर हालचाल पूछा। किसान चाची के अचार और मुरब्बे की महक को सुपर स्टार अमिताभ बच्चन ने भी महसूस किया और केबीसी के सेट पर बुलाया। इसी दौरान उन्हें पांच लाख रुपये और आटे की चक्की स्वरोजगार समूहों की मदद के लिये दी। किसान चाची दिल्ली के प्रगति मैदान से लेकर देश के दूसरे राज्यों में लगने वाले कृषि मेलों में स्वयं सहायता समूहों द्वारा बनाये गये ?उत्पादों को लेकर पहुंचती हैं। उनके स्टॉल पर लाइन लगकर भरोसे का सामान बिकता है।निसंदेह गांव की पगडंडियों पर रोज मीलों साइकिल चलाकर किसानों को आधुनिक तकनीकों के प्रति जागरूक करने वाली किसान चाची ?आज अपने काम को पद्मश्री मिलने से खासी ?उत्साहित हैं। वह मानती हैं कि खेती में महिलाएं हाड़तोड़ मेहनत करती हैं मगर उनके काम का सही मूल्यांकन कभी नहीं हो पाता। उनके नाम जमीन न होने से उनको सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पाता। इस दिशा में सरकार नही मिल पाता। इस दिशा में सरकार रचनात्मक भूमिका निभाये तो महिला घर की चौखट- चूंघट से निकलकर कृषि उत्पादों को बाजार तक पहुंचाकर आत्मनिर्भर बन सकती हैं।